name='verify-cj'/> चलते चलते: हॉकी और टेलीविज़न

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Sunday 16 March 2008

हॉकी और टेलीविज़न


इंडियन हॉकी टीम बीजिंग ओलंपिक से बाहर हो चुकी है और मीडिया भी अब तक काफ़ी हाय तौबा मचा चुका है। हर किसी को शिकायत है इंडियन हॉकी संघ अध्यक्ष के.पी.एस गिल से, मीडिया की माने तो गिल साहब को हटाने से हॉकी को फिर से पुनर्जीवित किया जा सकता हैं। मीडिया की इस कयावाद से हमेशा गुमनामी में खोए रहने वाले हॉकी दिग्गजों को मौका मिला जनता के सामने आने का, और उनमे से काफ़ी ने गिल साहब को खूब धोया। अभी मामला गरम है इसलिए मीडिया की हाँव हाँव चालू है। हालाँकि किसी भी चैनल ने चिली मे होने वाले महत्वपूर्ण मैच से पहले कोई 'खास प्रोग्राम' नही दिखाया, और ना तो किसी चैनल के खेल संवाददाता (मैं कहूँगा क्रिकेट संवाददाता) चिली मे मौजूद थे। यकीन मानिए दो हफ्तों बाद ना तो हॉकी और ना ही हॉकी दिग्गज मीडिया मे नज़र आएँगे, होगा तो सिर्फ़ इंडियन प्रिमियर लीग का शोर। तो, हॉकी की इस दुर्दशा का दोषी कौन है? हॉकी संघ तो सबसे उपर है ही पर हम आप और मीडिया भी कम दोषी नही है। 2003 में जब भारतीय टीम ने एशिया कप और चॅंपियन्स ट्राफी शानदार तरीके से जीती तो लगा हॉकी रास्ते पर है। इतना ही नही हेलसिंकी मे भी भारत ने अच्छे खेल का प्रदर्शन करते हुएदूसरा स्थान प्राप्त किया। दीपक ठाकुर, गगन अजीत सिंह, जुगराज सिंह, अर्जुन हल्लापा, और वीरेन रास्क़ुइन्हा जैसे कितने ही खिलाड़ियों को इन बड़ी जीतों के बाद बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। क्यों? मीडिया ने पूछा नही तो किसी ने बताया नही, मामला ख़तम। हाल ही मे एक खबर पढ़ी की भारतीय हॉकी कैप्टन प्रबोध तिर्की को दिल्ली के एक होटेल में रात छत पर गुज़ारनी पड़ी, कारण उनके लिए रूम बुक नही था। बैंगलूर मे रिपोर्टिंग के दौरान उन्हे इंटरव्यू करने का मौका मिला, मैने इतना सरल इंसान कभी नही देखा, इसलिए कोई हैरानी नही हुई जब उन्होनें किसी से इस घटना की शिकायत नही की। हम क्रिकेट टीम की विश्व कप से असमय विदाई तो आसानी से भूल जाते हैं पर हॉकी टीम को एक हार के बाद खारिज करने लगते हैं। आख़िर ऐसा क्या है जो क्रिकेट हर खेल से उपर है, कारण जानने के लिए बात करते है अस्सी के दशक के शुरुआती वर्षों की। भारतीय क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीता और लगभग उसी समय भारत में कलर टेलीविज़न का उदय हुआ। भारतीय हॉकी टीम के इतिहास के सबसे बुरे दिनों की पटकथा भी इसी दौर मे शुरू हुई। जहाँ हॉकी अपने उतार पर थी तो क्रिकेट का नशा परवान चढ़ता गया। कारण साफ है, टेलीविज़न की चमक दमक का फ़ायदा उठाने मे हॉकी पीछे रह गयी। हमारा राष्टीय खेल पीछे होता गया और क्रिकेट आगे। बाज़ार उसे ही चुनता है जो बिकता है, सो स्पॉन्सर्स भी क्रिकेट के साथ हो लिए। वापस 2008 में, इस हार से पहले हमने कभी हॉकी के लिए हाय तौबा नही मचाई, कभी कोई रिपोर्ट नही आई की हमारे खिलाड़ी किस तरह से तैयारी करते हैं। क्या हमें हक है हॉकी टीम के इस प्रदर्शन पर कुछ भी कहने का? शायद ही कोई आम आदमी या हमरे खेल पत्रकार मौजूदा हॉकी टीम के पूरे सदस्यों के नाम गिना पाएँगें। अगर हमनें 2003 में आवाज़ उठाई होती तो आज हमारी टीम ओलंपिक पदक की दौड़ मे शामिल होती। ये बात मैं पूरे विश्वास से कह सकता हू, नीचे दिए गये लिंक को देखें तो शायद आप भी कह पाएँगे। http://www.bharatiyahockey.org/yuvasena/

2 comments:

अनिल रघुराज said...

हल्ला मचने से फायदा तो होता है। पिछली बार हल्ला मचा तो हमारी हॉकी टीम को सहारा ने स्पांसर कर दिया। इस बार हल्ला मचा है कि तो हॉकी के मालिक-मुख्तार सुधरने को बाध्य होंगे। विकास जी, मुझे तो लगता है कि मीडिया में भले ही कितनी खामियां हों, वह हमारे समाज के व्यापक लोकतंत्रीकरण का वाहक बन रहा है। मीडिया एक तरह से जन दबाव को प्रदर्शित करता है, जिसका असर सकारात्मक ही होता है।

Vikas said...

अनिल जी मीडिया आज वाकई सकारात्मक भूमिका निभा रहा हैं. इसमे कोई दो राय नही है, ज़रूरत है मुद्दों को बीच मे ना छोड़ा जाए. जेसिका लाल केस मे भी कई महीनों तक मीडिया को लड़ाई लड़नी पड़ी थी. देखने वाली बात होगी की कब हॉकी की खबरें फिर से बॉक्स आइटम बन जाएँगी.